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वजूद की, तलब ना कर। हक है तेरा, रूह तक,सफर तो कर....।
हर बार सुलझा कर रखता हूँ ,फिर भी उलझी हुई मिलती है , ऐ ज़िन्दगी तू ही बता ज़रा ,तेरा मिजाज़  मेरे इयरफोन सा क्यूँ है...?

समझदारी

ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में अमने आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है टैंक आगे बढें कि पीछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग जिंदगी मय्यतों पे रोती है इसलिए ऐ शरीफ इंसानो जंग टलती रहे तो बेहतर है आप और हम सभी के आँगन में शमा जलती रहे तो बेहतर है।
लिख दूं सब कुछ...तो फायदा क्या? कभी तुम वो भी तो पढो... जो हम लिख नहीं पाते।।

चलो ......

चलो, यादों के साथ टहलने चले चलो, पलकों के साथ झपकने चले चलो, ख़्वाबों के साथ सोने चले चलो, फूलों के साथ महकने चले चलो, कंगन के साथ खनकने चले चलो, गीतो के साथ गुनगुनाने चले चलो, कहानियों के साथ कुछ सुनने,सुनाने चले चलो, क़लम के साथ लिखने,लिखाने चले चलो, किसी ग़ैर को अपनाने चले चलो, अब हम और तुम मिलने चले चलो, यादों के साथ टहलने चले

दौर-ए-उम्र

एक उम्र वो थी,की जादू में भी यकीन था। एक उम्र ये है,की हक़ीक़त पर भी शक़ है।।

हद-अनहद

रो दूँ अगर तुम्हारे सामने तो समझ जाना तुम। कि मेरी बर्दास्त करने की वो आखरी हद थी।