वजूद की, तलब ना कर। हक है तेरा, रूह तक,सफर तो कर....।
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समझदारी
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ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में अमने आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है टैंक आगे बढें कि पीछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग जिंदगी मय्यतों पे रोती है इसलिए ऐ शरीफ इंसानो जंग टलती रहे तो बेहतर है आप और हम सभी के आँगन में शमा जलती रहे तो बेहतर है।
चलो ......
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चलो, यादों के साथ टहलने चले चलो, पलकों के साथ झपकने चले चलो, ख़्वाबों के साथ सोने चले चलो, फूलों के साथ महकने चले चलो, कंगन के साथ खनकने चले चलो, गीतो के साथ गुनगुनाने चले चलो, कहानियों के साथ कुछ सुनने,सुनाने चले चलो, क़लम के साथ लिखने,लिखाने चले चलो, किसी ग़ैर को अपनाने चले चलो, अब हम और तुम मिलने चले चलो, यादों के साथ टहलने चले